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धनबाद : जादूगर पीसी सरकार के जादू के बारे में आपने जरूर सुना होगा, भेलाटांड़ में जमीन से जुड़ा एक मामला भी इन दिनों चर्चा में है।

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News Star Bharat

, ब्यूरो रिपोर्ट,

धनबाद : जादूगर पीसी सरकार के जादू के बारे में आपने जरूर सुना होगा। आंखों के सामने चीजों को गायब कर देना उनकी कला का हिस्सा था। धनबाद के भेलाटांड़ में जमीन से जुड़ा एक मामला भी इन दिनों चर्चा में है। फर्क इतना है कि यहां किसी चीज के गायब होने की बात नहीं है, बल्कि जमीन के दस्तावेज, म्यूटेशन और उसके स्वामित्व को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।

भेलाटांड़ में करीब 38 प्लॉटों के म्यूटेशन रद्द होने के बाद वहां रहने वाले परिवारों की चिंता बढ़ गई है। जिन लोगों ने जमीन खरीदकर अपने घर बनाए, उनका कहना है कि उन्होंने उपलब्ध दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर जमीन की खरीद की थी। अब म्यूटेशन रद्द होने के बाद वे प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।

 

म्यूटेशन रद्द होने के बाद बढ़ी परेशानी

 

भुक्तभोगियों के अनुसार, संबंधित जमीनों की खरीद-बिक्री के बाद उनका निबंधन कराया गया था और बाद में म्यूटेशन भी हुआ। जमीन पर कई लोगों ने मकान का निर्माण भी करा लिया।

बाद में जमीन की प्रकृति और स्वामित्व को लेकर प्रशासनिक स्तर पर जांच हुई। जांच के बाद करीब 38 प्लॉटों के म्यूटेशन रद्द किए जाने की जानकारी सामने आई।

अब इन परिवारों का कहना है कि यदि जमीन सरकारी थी तो खरीद-बिक्री और म्यूटेशन की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई, इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उनका कहना है कि उन्होंने जानबूझकर किसी सरकारी जमीन पर कब्जा नहीं किया था।

 

रवि यादव और पंकज कुमार की भूमिका पर शिकायतकर्ताओं ने उठाए सवाल

 

मामले में राजीव रंजन उर्फ रवि यादव और पंकज कुमार के नाम शिकायतकर्ताओं की ओर से सामने आए हैं। आरोप लगाया गया है कि दोनों के माध्यम से संबंधित जमीनों की खरीद-बिक्री हुई।

शिकायतकर्ताओं का यह भी दावा है कि जमीन के दस्तावेज तैयार कराने और खरीददारों को जमीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में कई लोग जुड़े हुए थे।

हालांकि, इन आरोपों की वास्तविकता और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा। संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आने पर उसे भी खबर में प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए।

 

*प्रवीण सिन्हा का नाम भी चर्चा में*

 

भेलाटांड़ जमीन मामले में प्रवीण सिन्हा का नाम भी सामने आया है। भुक्तभोगियों का कहना है कि कई जमीन दस्तावेजों में प्रवीण सिन्हा बतौर गवाह हस्ताक्षरकर्ता हैं।

 

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उन्होंने कुछ लोगों को जमीन की खरीद के सिलसिले में संबंधित पक्षों से मिलवाने में भूमिका निभाई थी। इसके बदले कमीशन मिलने का भी आरोप लगाया गया है।

 

म्यूटेशन रद्द होने के बाद कुछ खरीदारों ने प्रवीण सिन्हा से संपर्क किया। इस दौरान विवाद की स्थिति बनने की भी बात सामने आई है। मामले में पुलिस जांच की स्थिति और प्रवीण सिन्हा की भूमिका को लेकर आधिकारिक जानकारी सामने आना बाकी है।

 

*प्रोजेक्ट के नाम बदलने पर भी सवाल*

 

भेलाटांड़ में जमीन से जुड़े प्रोजेक्ट को अलग-अलग समय पर हरि धाम, श्री हरि धाम और सुखी धाम नाम से प्रचारित किए जाने की बात सामने आई है।

 

भुक्तभोगियों का कहना है कि अलग-अलग नामों से जमीन और निवेश से संबंधित गतिविधियां चलती रहीं। कुछ लोगों ने निवेश के नाम पर रकम दिए जाने और निर्धारित समय में बेहतर रिटर्न का भरोसा दिए जाने की भी शिकायत की है।

 

इन शिकायतों की स्वतंत्र जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि संबंधित कंपनियों या व्यक्तियों के बीच किस प्रकार के वित्तीय लेन-देन हुए थे।

 

*निर्माणा सिटी को लेकर भी शिकायत*

 

भेलाटांड़ मामले के बाद अब बिरसा मुंडा पार्क के समीप निर्माणा सिटी से संबंधित जमीन को लेकर भी कुछ लोगों ने सवाल उठाए हैं।

 

शिकायतकर्ताओं का दावा है कि परियोजना से जुड़े कुछ हिस्सों में सरकारी जमीन होने की आशंका है। मुख्य गेट से संबंधित जमीन को लेकर भी शिकायत किए जाने की बात कही गई है। शिकायत के बाद एसडीएम स्तर से धारा 144 लागू किए जाने का उल्लेख किया गया है।

 

इसके अलावा कुछ रैयती जमीनों की पूर्व बिक्री को लेकर भी विवाद का दावा किया गया है। शिकायतकर्ताओं ने जिला प्रशासन से परियोजना से संबंधित जमीन के स्वामित्व, दस्तावेज और निर्माण की वैधता की जांच कराने की मांग की है।

 

*हब इंडिया से हब इंडिया रियलिटी तक*

 

परियोजना से जुड़े लोगों द्वारा पहले हब इंडिया और बाद में हब इंडिया रियलिटी नाम का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। इस संबंध में भी शिकायतकर्ताओं ने प्रशासन से दस्तावेजों की जांच कराने की मांग की है।

 

परियोजना के प्रचार-प्रसार के लिए अखबारों में विज्ञापन और शहर के विभिन्न हिस्सों में होर्डिंग लगाए जाने की बात कही गई है।

 

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि परियोजना में कुछ निर्माण कार्य आवश्यक स्वीकृतियों के बिना किए जा रहे हैं। इस आरोप की पुष्टि संबंधित विभाग के रिकॉर्ड और स्थल जांच से ही हो सकती है।

 

*मनीष कुमार की भूमिका पर भी शिकायत*

 

निर्माणा सिटी को लेकर शिकायत करने वाले कुछ लोगों ने मनीष कुमार की भूमिका का भी उल्लेख किया है। उनका आरोप है कि मनीष कुमार संभावित खरीदारों को परियोजना और जमीन से संबंधित जानकारी देकर निवेश के लिए तैयार करते हैं।

 

कमीशन या भुगतान से संबंधित आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि के लिए वित्तीय दस्तावेज और अन्य साक्ष्यों की जांच जरूरी होगी।

 

कुछ भुक्तभोगियों का यह भी दावा है कि उन्हें विवाद खत्म करने के लिए निर्माणा सिटी में जमीन देने का प्रस्ताव दिया गया था। इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

 

*सुरेंद्र जिंदल का नाम भी सामने आया*

 

पूरे मामले में सुरेंद्र जिंदल का नाम भी शिकायतों और आरोपों के संदर्भ में सामने आया है। जिंदल का नाम पूर्व में बालू कारोबार से जुड़े एक मामले में जांच एजेंसियों की कार्रवाई के दौरान चर्चा में रहा है।

 

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बालू कारोबार से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितता के मामले में जांच एजेंसियों ने उनके खिलाफ कार्रवाई की थी। इस मामले में गिरफ्तारी, संपत्ति जब्ती और बैंक खातों पर कार्रवाई की बात भी सामने आई थी।

 

हालांकि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ लगे आरोपों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता, जब तक जांच या न्यायिक प्रक्रिया में उसकी पुष्टि न हो।

 

*सूरमा प्रॉपर्टीज को लेकर भी जांच की मांग*

 

शिकायतकर्ताओं ने सूरमा प्रॉपर्टीज नामक कंपनी और निर्माणा सिटी से जुड़े संभावित वित्तीय लेन-देन की जांच की मांग की है।

 

दावा किया गया है कि कंपनी से जुड़े लोगों द्वारा परियोजना में जमीन की खरीद की जा रही है। कंपनी के निदेशक मंडल में जिंदल के परिवार के सदस्यों के शामिल होने की बात भी कही गई है।

 

शिकायतकर्ताओं ने संबंधित जांच एजेंसियों से कंपनियों के बैंक खातों, जमीन की खरीद-बिक्री और वित्तीय लेन-देन की जांच करने की मांग की है।

 

यदि जांच एजेंसियां इस मामले में कोई आधिकारिक निष्कर्ष जारी करती हैं तो उससे पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

 

*38 परिवारों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल*

 

भेलाटांड़ का मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि संबंधित जमीन सरकारी थी, तो उसका निबंधन किस आधार पर हुआ? म्यूटेशन की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई? जमीन का नक्शा स्वीकृत होने की स्थिति में संबंधित विभागों ने क्या जांच की? और यदि प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?

 

दूसरी ओर, जमीन खरीदने वाले परिवारों का कहना है कि उन्होंने उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों पर भरोसा करके अपनी मेहनत की कमाई लगाई थी। इसलिए यदि रिकॉर्ड में कोई गड़बड़ी हुई है तो उन्हें राहत देने और वास्तविक जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है।

 

अब भुक्तभोगियों की नजर जिला प्रशासन की जांच पर है। उन्होंने भेलाटांड़ के साथ-साथ निर्माणा सिटी से जुड़े आरोपों की भी निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है, ताकि जमीन खरीदने वाले लोगों के अधिकार और भविष्य दोनों सुरक्षित रह सकें।

 

फिलहाल इस पूरे मामले में लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि संबंधित प्रशासनिक जांच, दस्तावेजों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्ष से ही होगी।

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